सड़कों पर दम तोड़ती 108 सेवा

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बदहाल स्थिति में 108 सेवा

DEHRADUN: उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छुपी नहीं है. पहाड़ों में हाॅस्पिटल नहीं हैं. कुछ एमरजेंसी हो भी जाए तो 108 के इंतजार के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता. पर जरा सोचिए अगर कुछ दिनों के लिए 108 ठप्प पड़ जाए तो जिंदगी बचाना मुश्किल हो जाएगा. इतना ही नहीं 108 की हालात इस कदर खराब है कि वाहन 10 साल पुराने होने के बाबजूद भी मरीजों को अस्पताल पंहुचाने का काम कर रही है. 108 प्रबंधन ने इस बाबत कई बार सरकार से बात करनी चाही लेकिन नतीजा सिफर रहा.?

एक नजर 108 पर

उत्तराखंड राज्य में 108 सेवा की वर्तमान समय में कुल 138 एम्बुलेंस वाहन संचालित की जा रही हैं. 108 सेवा की शुरुवात प्रदेश में 15 मई 2008 से की गई थी. 108 सेवा के बेड़े में सन 2008 में 90 एम्बुलेंस वाहनों के बेड़े को लाया गया था, 2010 में 18 एम्बुलेंस और 2011 में 32 नई एम्बुलेंस वाहनों को इस सेवा से जोड़ा गया था. उसके बाद कोई भी एम्बुलेंस वाहन इस सेवा से नही जुड़ सकी. वर्तमान में 108 सेवा की अधिकतम एम्बुलेंस वाहन लगभग 3 लाख से 5 लाख किलोमीटर का सफर पूरा कर चुकी हैं. इन एम्बुलेंस वाहनों को बदला जाना अत्यंत आवश्यक है. एम्बुलेंस वाहनों के साथ वाहनों में रखे गए उपकरण जैसे स्ट्रेचर, सक्शन मशीन आदि भी पुराने हो चुके हैं. बिना नई एम्बुलेंस वाहनों के इस सेवा का सुधार संभव नही है.

बकाया भुगतान भी लटका

108 के भुगतान पर एकबार फिर से ग्रहण लग चुका है. प्रदेश में दम तोड़ रही 108 एमरजेंसी सेवा के लिए शासन द्वारा जारी छह करोड़ रुपये का भुगतान बीच में लटक गया है. कारण यह कि अब तक विभाग में डीजी हेल्थ ही नियुक्ति नहीं हो पाई है. प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था कार्यवाहक डीजी के भरोसे चल रही है. बता दें कि विभाग के मुखिया के तौर पर किसी भी विभाग के कार्यवाहक अधिकारी को वित्तीय अधिकार नहीं होते है. इधर पूरे प्रदेश में जगह-जगह एंबुलेंस सेवा के पहिए थम रहे हैं. इसका कारण जीवीके कंपनी के पास वाहनों को दुरुस्त करने और कर्मचारियों के भुगतान के लिए पैसा नही है. 2008 में यह सेवा शुरू हुई थी. इसने शुरुआत में काफी अच्छा काम भी किया, मगर धीरे-धीरे यह व्यवस्था पटरी से उतरने लगी. अब साल मार्च 2018 में कंपनी और सरकार के बीच करार समाप्त हो रहा है.


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