जम्मू एयरपोर्ट पर दिखेगी पहाड़ी चित्रकला की झलक, दून के इस युवा ने बनाई पेंटिंग | postmanindia

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अक्सर ये कहा जाता है कि आप में हुनर हो तो उसे दिखाने का मौका कभी ण कभी मिल ही जाता है. लुप्त होती जा रही पहाड़ी चित्रकला शैली को फिर से जीवंत करने का बीड़ा उठाया है उत्तराखण्ड के युवा अंशु मोहन ने. अंशु मोहन ने हाल ही में बशोली (बसोहली) शैली में एक पेंटिंग तैयार की है जो जम्मू एयरपोर्ट की शोभा बढ़ायेगी. देहरादून के मोथरोवाला निवासी 35 वर्षीय अंशु मोहन की पहाड़ी पेंटिंग्स पर स्पेशिलाईजेशन है. वर्तमान में वह ग्वालियर के मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं. इससे पहले अंशू कई म्यूजियम में पेंटिंग बनाकर अपनी सेवा दे चुके हैं. उनका कहना है कि मौजूदा समय में प्राचीन भारतीय चित्रकला शैली समाप्त हो रही हैं और युवा वेस्टर्न पेंटिंग के दीवाने होते जा रहे हैं.

उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में वह पहाड़ी चित्रकला शैली पर शोध कर रहे हैं. पहाड़ी पेंटिंग (पहाड़ी क्षेत्र की पेंटिंग) भारतीय चित्रकला की पहचान रही है. इसकी शुरआत उत्तर भारत के हिमालय के पहाड़ी राज्यों में 17 वीं से 19 वीं सदी के दौरान हुई. बसोहिली (बशोली), मानकोट, नूरपुर, चंबा, कांगड़ा, गुलर, मंडी और गढ़वाल क्षेत्र में यह चित्रकला बेहद प्रचलित थी. विख्यात कलाकार नैनसुख इस शैली के संवर्धक थे जिनका जन्म 18 वीं शताब्दी के बीच हुआ था. इसके बाद उनकी दो पीढ़ियों ने इस कला को आगे बढाया. उन्होंने बताया कि पहाड़ी चित्रकला का विकास 17 वीं से 19 वीं सदी के दौरान जम्मू से अल्मोड़ा, गढ़वाल एवं हिमाचल प्रदेश में हुआ. प्रत्येक शैली में एक दुसरे से भिन्नता दिखाई पड़ती हैं.

बसोली पेंटिंग जम्मू और कश्मीर में बसोली से उत्पन्न हुई हैं में बड़े गहरे रंगों का प्रयोग होता है. अंशु मोहन ने बताया कि ये शैली धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है. हाल ही में जम्मू एयरपोर्ट अथॉरिटी ने उनसे सम्पर्क करके उन्हें बशोली शैली की कलाकृति बनाने की जिम्मेदारी सौंपी. जिसे वे दो माह में पूरा की चुके हैं. जम्मू एयरपोर्ट में लगने वाली पेंटिंग को दो हिस्सों में बनाया जायेगा. पहली 25 फीट लंबी 3 फीट ऊँची वहीँ दूसरी 23 फिट लम्बी और 3 फीट ऊँची पेंटिंग बनवाई गई है. उन्होंने बशोली शैली में कृष्ण-राधा पर एक प्रतिकृति श्रृंखला चित्रित की है. जो रसमंजरी श्रृंखला का एक हिस्सा है.


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