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Sunday, August 9, 2026


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दिल्ली के भूजल में जहर: पानी पीने से कैंसर का खतरा, बच्चों को हो सकता है ‘ब्लू बेबी’ सिंड्रोम

नई दिल्ली: राजधानी के भूजल में नाइट्रेट, फ्लोराइड, खारापन (सलिनिटी), क्लोराइड, आयरन, आर्सेनिक और यूरेनियम जैसे हानिकारक तत्व तय सीमा से ज्यादा हैं। यह खुलासा केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को सौंपी ताजा रिपोर्ट में हुआ है। इसने दिल्ली में भूजल की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
‘एनुअल ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट 2024’ के अनुसार, यह दूषित पानी पीने वालों के लिए स्वास्थ्य के लिए खतरा है और इससे उच्च रक्तचाप, किडनी की बीमारियां, दांत व हड्डियों की कमजोरी और बच्चों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा, खेती पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है क्योंकि मिट्टी में अधिक सोडियम और अन्य तत्व फसल की पैदावार को प्रभावित कर रहे हैं।
रिपोर्ट में सीजीडब्ल्यूबी ने सुझाव दिया है कि वर्षा जल संचयन, सुरक्षित वैकल्पिक पानी स्रोत और खाद प्रबंधन जैसी सावधानियां तुरंत अपनाई जाएं। मामला एक मीड़िया रिपोर्ट पर आधारित है। एनजीटी ने खुद से इस पर कार्रवाई शुरू की और सीजीडब्ल्यूबी से रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट में 2023 के पूर्व-मानसून (मई) में लिए गए सैंपलों का विश्लेषण किया गया है। दिल्ली में 103 सैंपलों की जांच की गई, जिसमें कई जिलों में समस्या पाई गई।
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में शामिल है और 23.30 फीसदी सैंपलों में नमक की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई है। विशेष रूप से उत्तर, उत्तर-पश्चिम, शाहदरा, दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम जिले प्रभावित हैं। मानसून से पहले और बाद की तुलना में स्थिति और बिगड़ी है, क्योंकि 24 सैंपलों में से 11 जगहों पर पहले समस्या थी, जो बढ़कर 13 स्थानों पर पहुंच गई। ज्यादा नमक वाला पानी पीने से उच्च रक्तचाप और किडनी की समस्या हो सकती है, वहीं खेती पर भी इसका बुरा असर पड़ता है और फसलें खराब हो सकती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 20.39 फीसदी सैंपलों में नाइट्रेट तय सीमा से ज्यादा पाया गया है। प्रभावित जिले नई दिल्ली, उत्तर, उत्तर-पश्चिम, दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम हैं। मानसून से पहले चार जगहों पर यह समस्या थी, जो बाद में बढ़कर छह जगहों पर पहुंच गई। नाइट्रेट मुख्य रूप से खाद और प्रदूषण के कारण पानी में आता है। ज्यादा नाइट्रेट वाला पानी पीने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है और शिशुओं में ‘ब्लू बेबी’ सिंड्रोम जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। इसके अलावा, जांच में पाया गया कि 17.48 फीसदी सैंपलों में क्लोराइड तय सीमा से ज्यादा है। ज्यादा क्लोराइड वाला पानी पीने से स्वाद खराब होता है और लंबे समय में किडनी पर भी बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि, दिल्ली में तटीय इलाकों जैसी प्राकृतिक समस्या नहीं है, लेकिन औद्योगिक प्रदूषण के कारण क्लोराइड की मात्रा बढ़ रही है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पूर्व, नजुल लैंड और दक्षिण-पूर्व जिलों में पानी में आयरन ज्यादा पाया गया है, जिससे पानी लाल हो जाता है और लंबे समय तक पीने से पेट की समस्याएं हो सकती हैं। वहीं, पूर्व और दक्षिण-पूर्व जिलों में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है, जो त्वचा के कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। यूरेनियम की समस्या भी गंभीर है, खासकर उत्तर, उत्तर-पश्चिम, दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम जिलों में है। यहां 7.77 फीसदी सैंपलों में यह रेडियोएक्टिव तत्व पाया गया। यूरेनियम लंबे समय में किडनी और कैंसर का खतरा बढ़ाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 16.50 प्रतिशत सैंपलों में फ्लोराइड तय सीमा से ज्यादा पाया गया है। नई दिल्ली, उत्तर, उत्तर-पश्चिम, शाहदरा, दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम जिले इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। मानसून से पहले जहां सात स्थानों पर यह समस्या थी, वहीं मानसून के बाद यह बढ़कर नौ जगहों पर पहुंच गई। ज्यादा फ्लोराइड वाला पानी पीने से दांतों पर दाग पड़ सकते हैं और हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। बच्चों में इसका असर ज्यादा गंभीर होता है और लंबे समय तक यह समस्या रहने पर हड्डियों से जुड़ी बीमारियां बढ़ सकती हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि खराब भूजल का असर दिल्ली और उसके आसपास की खेती पर पड़ रहा है। भूजल की सिंचाई क्षमता की जांच एसएआर और आरएससी के आधार पर की गई है। इसके अनुसार, 12.62 प्रतिशत सैंपलों में सोडियम का मध्यम स्तर पाया गया है, जो सिंचाई के लिए पूरी तरह खतरनाक नहीं है, लेकिन इसमें सावधानी बरतना जरूरी है। वहीं, 7.77 प्रतिशत सैंपल आरएससी के आधार पर असुरक्षित पाए गए हैं। इससे सेंट्रल, नई दिल्ली, उत्तर, उत्तर-पश्चिम, दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम जिले प्रभावित हैं।
रिपोर्ट में भूजल की बिगड़ती हालत को सुधारने के लिए कई अहम सिफारिशें की गई हैं। इसमें कहा गया है कि खेती में रासायनिक खाद का कम इस्तेमाल किया जाए और वर्षा जल संरक्षण को बढ़ावा दिया जाए, ताकि भूजल को फिर से भरने में मदद मिल सके। दूषित इलाकों में लोगों को सुरक्षित वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध कराने की जरूरत बताई गई है। रिपोर्ट में यह भी जोर दिया गया है कि भूजल की समस्या से निपटने के लिए सरकार, वैज्ञानिकों और आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। इसके अलावा बताया गया है कि राष्ट्रीय भूजल गुणवत्ता पर एक विस्तृत रिपोर्ट सितंबर 2026 तक जारी की जाएगी, जिसमें इस समस्या के स्थायी समाधान सुझाए जाएंगे।

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