नई दिल्ली। नरेन्द्र मोदी रविवार को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। इसके पहले शनिवार की देर रात तक सरकार में भागीदारी को लेकर एनडीए के सहयोगी दलों के बीच सामंजस्य बना लिया गया है। किस दल को कितनी हिस्सेदारी मिलनी है और पहले चरण में किस-किस सांसद को मंत्रिपरिषद में जगह मिल सकती है, इसका निर्णय कर लिया गया है।
नई सरकार के स्वरूप में सामाजिक समीकरण और देश के विकास की आकांक्षा का भरपूर ख्याल रखा गया है। सहयोगी दलों का सम्मान और समन्वय बनाए रखने के रास्ते तलाश लिए गए हैं। एनडीए में भाजपा के बाद टीडीपी, जदयू, शिवसेना और लोजपा (आर) चार बड़े दल हैं।
रविवार को टीडीपी से तीन, जदयू से दो, शिवसेना एवं लोजपा (आर) से एक-एक मंत्री की शपथ कराई जाएगी। बिहार में जदयू एवं भाजपा की सीटें बराबर हैं। इसलिए मंत्रिमंडल में सदस्यों की संख्या भी उसी अनुपात में होगी। दोनों दलों से दो-दो कैबिनेट एवं दो राज्य मंत्री बनाए जा सकते हैं। सूत्रों का दावा है कि रविवार को सिर्फ कैबिनेट मंत्रियों को ही शपथ दिलाई जाएगी।
जदयू सांसद राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह एवं राज्यसभा सदस्य रामनाथ ठाकुर को कैबिनेट में स्थान मिलना तय है। संजय झा एवं वाल्मीकि नगर के सांसद सुनिल कुमार को भी मंत्री बनाया जाएगा, लेकिन इनका नंबर बाद में आ सकता है। बिहार से हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) प्रमुख जीतनराम मांझी एवं लोजपा (आर) प्रमुख चिराग पासवान को भी कैबिनेट में ही जगह मिलनी है। रविवार को चारों नरेन्द्र मोदी के साथ शपथ ले सकते हैं।
बिहार भाजपा के दो सदस्य भी रविवार को शपथ ले सकते हैं। आंध्र प्रदेश में भाजपा के सहयोगी तेलुगु देसम पार्टी (टीडीपी) एवं जनसेना पार्टी को भी मंत्रिमंडल में जगह दी जा रही है। टीडीपी के 16 और जनसेना के दो सदस्य हैं। सूत्रों का दावा है कि रविवार को टीडीपी के तीन एवं जनसेना के एक सदस्य मंत्रिपद की शपथ लेंगे। रालोद को भी मंत्री पद मिल रहा है। जयंत चौधरी को कैबिनेट में रखा जा रहा है।
सूचना है कि प्रधानमंत्री ने मंत्रिपरिषद के सदस्यों के नाम के साथ-साथ मंत्रालयों की जिम्मेवारी भी लगभग तय कर दी है। इसके लिए सहयोगी दलों से प्रस्ताव मांगे गए थे, किंतु नीतीश कुमार एवं चंद्रबाबू नायडू समेत सभी दलों के शीर्ष नेताओं ने सबकुछ नरेन्द्र मोदी पर ही छोड़ दिया है। इसके पहले भाजपा समेत सभी घटक दलों के नेताओं ने दो दिनों के विमर्श एवं सभी पक्षों पर विचार करने के बाद अंतिम सूची तैयार की है। सूत्र बताते हैं कि कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की कमान भाजपा के पास ही रह सकती है।
बिहार में डेढ़ वर्ष बाद विधानसभा चुनाव होना है। इसलिए भाजपा जातीय समीकरण से कोई समझौता करने के पक्ष में नहीं है। यही कारण है कि काराकाट संसदीय सीट से निर्दलीय प्रत्याशी पवन सिंह के चलते भाकपा माले के राजाराम सिंह से चुनाव हारने वाले उपेंद्र कुशवाहा को भी भाजपा जोड़कर रखना चाहती है। इस बार बिहार में कुशवाहा फैक्टर अत्यंत प्रभावी रहा है। इसके चलते भाजपा को चार-पांच सीटों पर हार का सामना करना पड़ा है। भाजपा उपेंद्र को मंत्रिमंडल में लाकर कुशवाहा वोट बैंक में सकारात्मक संदेश देना चाहती है।
मोदी कैबिनेट का फॉर्मूला तय, टीडीपी-जदयू से इतने नेताओं को मिलेगी जगह; चिराग पासवान का भी मंत्री बनना तय
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