दीवाली पर उल्लू से तंत्र-मंत्र, तस्कर सक्रीय, वन विभाग की चौकसी ।Postmanindia

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दीपावली से पहले देहरादून में उल्लू तस्करों पर नजर रखने के लिए वन विभाग ने विशेष अभियान की शुरुआत कर दी है. देहरादून के आसपास राजा जी पार्क से सटे जंगलों में वन विभाग की स्पेशल फोर्स उल्लू तस्करों पर नजर बनाए हुए हैं. जानकारी के अनुसार टपकेश्वर रायपुर, सॉग नदी के आसपास वन विभाग की टीम में लगातार गश्त कर रही है. आपको बता दें कि दीवाली के दौरान तांत्रिक गतिविधियों में उल्लू का इस्तेमाल होता है. इसके लिए उसे महीनाभर पहले से साथ में रखा जाता है. दिवाली पर बलि के लिए तैयार करने के लिए उसे मांस-मदिरा भी दी जाती है. पूजा के बाद बलि दी जाती है और बलि के बाद शरीर के अलग-अलग अंगों को अलग-अलग जगहों पर रखा जाता है जिससे समृद्धि हर तरफ से आए.

माना जाता है कि उसकी आंखों में सम्मोहित करने की ताकत होती है, लिहाजा उल्लू की आंखें ऐसी जगह रखते हैं जहां मिलना-मिलाना होता हो. पैर तिजोरी में रखा जाता है. चोंच का इस्तेमाल दुश्मनों को हराने के लिए होता है. वशीकरण, मारण जैसी कई तांत्रिक क्रियाओं के लिए उल्लुओं का इस्तेमाल होता है. सम्मोहन के लिए उल्लू के नाखून से काजल भी बनाया जाता है. इसे लेकर बहुत सी मान्यताएं हैं जो जगह के हिसाब से बदलती रहती हैं.

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दरअसल दीवाली आते ही उल्लुओं के सिर पर खतरा मंडराने लगता है. पक्षी बेचने वाले इसके अवैध शिकार पर निकल पड़ते हैं. दिवाली पर एक उल्लू 10 हजार से लेकर लाखों में बेचा जाता है. पक्षी के वजन, रंग और दूसरी विशेषताओं को देखकर दाम तय किया जाता है. भारतीय वन्य जीव अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत उल्लू संरक्षित पक्षियों के तहत आता है. उल्लू को संरक्षित पक्षियों की सूची में प्रथम श्रेणी में शामिल किया गया है, पहले यह चतुर्थ श्रेणी में था. उल्लू को पकड़ने-बेचने पर तीन साल या उससे ज्यादा की सजा का नियम है. लेकिन दिवाली पर इस प्रावधान की खूब धज्जियां उड़ाई जाती हैं. हालांकि वनों में अलर्ट घोषित किया जाता है लेकिन शिकारी बाज नहीं आते, उल्लू शिकार बनते ही हैं.

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