रांची । Jharkhand High Court के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस एसएन प्रसाद की अदालत ने ट्रेडमार्क विवाद मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य में जहां किसी कामर्शियल विवाद का मूल्य तीन लाख रुपये से एक करोड़ रुपये तक है, वहां के सिविल जज (सीनियर डिविजन) को ही ट्रेडमार्क उल्लंघन के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार है।
Court ने जमशेदपुर की निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए फिर से मामले की सुनवाई करने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने उक्त आदेश खेमका फूड प्रोड्क्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दाखिल अपील स्वीकार करते हुए 29 जुलाई, 2024 के आदेश निरस्त कर दिया।
यह अपील सिविल जज (सीनियर डिविजन)-प्रथम, जमशेदपुर के उस आदेश के खिलाफ अपील दाखिल की गई थी। कंपनी ने गृहस्थी भोग नाम से आटा बेचने वाले एक अन्य पक्ष पर ट्रेडमार्क उल्लंघन का आरोप लगाया था।
कंपनी का दावा है कि वह वर्ष 2001 से आटा बना रही है और गृहस्थी भोग नाम का प्रयोग करती आ रही है। वर्ष 2005, 2012 और 2014 में ट्रेडमार्क के लिए आवेदन भी किए गए। फरवरी 2023 में कंपनी को पता चला कि एक और कंपनी गृहस्थी भोग नाम से आटा बेच रही है।
इसके बाद कंपनी ने उन्हें नोटिस भेजा और फिर अप्रैल 2023 में मध्यस्थता के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जमशेदपुर में आवेदन दिया। जब मध्यस्थता असफल रही तो कंपनी ने अगस्त 2023 में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) जमशेदपुर के यहां याचिका दाखिल की। इस पर सुनवाई के दौरान दूसरे पक्ष ने आपत्ति जताते हुए कहा कि मामले की सुनवाई का अधिकार इस न्यायालय के पास नहीं है। उनका कहना था कि ऐसा विवाद केवल अतिरिक्त जिला एवं सेशन जज अथवा न्यायायुक्त ही सुन सकते हैं। निचली अदालत ने इसे दूसरी कोर्ट में भेजने का निर्देश दिया।
इस आदेश के खिलाफ खेमका कंपनी ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। कहा गया कि सरकार ने 2021 में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) को कामर्शियल कोर्ट घोषित किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिला कोर्ट का मतलब सिर्फ जिला जज नहीं होता, बल्कि वह अदालत भी जिसमें उस क्षेत्राधिकार में मामला सुना जा सकता है।
ट्रेड मार्क उल्लंघन मामले में Jharkhand High Court का बड़ा फैसला, तीन लाख से एक करोड़ के विवाद में सिविल जज को सुनवाई का अधिकार
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