नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर महिला की प्रजनन स्वायत्ता और इच्छा को महत्व देने पर जोर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी नाबालिग बच्ची को गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अजन्मे बच्चे को नुकसान होने की दलील पर नाबालिग की गर्भावस्था जारी रखने की एम्स की मांग ठुकराते हुए कहा कि यह नाबालिग से दुष्कर्म का मामला है। पीड़िता को जिंदगी भर इस घटना का जख्म और आघात झेलना पड़ेगा।
कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा वह कानून में संशोधन करने पर विचार करे ताकि दुष्कर्म से हुई गर्भावस्था के मामले में 20 सप्ताह बाद भी गर्भ समाप्त कराया जा सके उसमें कोई समय सीमा लागू न हो। कानून को लचीला और बदलते समय के साथ तालमेल बिठाने वाला होना चाहिए। साथ ही कानून में ऐसा बदलाव भी करें कि ऐसे मुकदमे एक सप्ताह के अंदर पूरे हो जाएं। आखिर उस बच्ची को मुकदमे के दौरान होने वाले मानसिक तनाव को भी क्यों झेलना पड़े।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जोयमाल्या बाग्ची की पीठ ने नाबालिग के 30 सप्ताह के गर्भ को नष्ट करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ एम्स के क्यूरोटिव याचिका दाखिल करने पर भी नाराजगी जताते हुए कहा कि मेडिकल प्रोफेशनल्स के विशेष ज्ञान का सिद्धांत लोगों की इच्छा पर हावी नहीं हो सकता। डॉक्टर मरीजों के लिए फैसले नहीं ले सकते। यहां तक कि जजों को भी तय प्रक्रिया के अनुसार ही काम करना होता है।
कोर्ट ने कहा कि निर्णय लेना नागरिक का अधिकार है। एम्स उसकी जगह निर्णय नहीं ले सकता। हमें व्यक्ति की इच्छा का सम्मान करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह भ्रूण बनाम बच्ची की लड़ाई है। आप अजन्मे बच्चे की बात कर रहे हैं लेकिन उस उस बच्ची की ओर नहीं देख रहे जिसने इतना दर्द सहा है। बच्ची का हर हाल में गरिमामय जीवन होना चाहिए। आप उसके परिवार के बारे में सोचिए। कोर्ट ने नाबालिग बच्ची के बारे में भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह चाइल्ड रेप का मामला है। वो अभी खुद बच्ची है उसे मां बनने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि अगर उसे गर्भपात की इजाजत नहीं दी गई तो, उस पीड़िता को जिंदगी भर के लिए गहरा जख्म और मानसिक आघात झेलना पड़ेगा।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अगर मां को कोई स्थाई विकलांगता का खतरा नहीं है तो गर्भपात करवा देना चाहिए। किसी पर भी अनचाहा गर्भ थोपा नहीं जा सकता। पीठ ने कहा जरा सोचिए वह अभी बच्ची है उसे अभी आगे पढ़ाई करना चाहिए लेकिन हम उसे मां बनाने पर तुले हैं। उसके दर्द के बारे में सोचना चाहिए जो उसने झेला है।
कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब की जब एम्स की ओर से दाखिल क्यूरेटिव याचिका को मेंशन करते हुए एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने गर्भपात में दिक्कतें बताते हुए गर्भपात का आदेश वापस लेने का कोर्ट से अनुरोध किया। भाटी ने कहा कि गर्भ 30 सप्ताह का हो गया है वह उन्नत है और सजग है अगर ऐसे में प्रिमेच्योर जन्म हुआ तो उसमें स्थाई विकलांगता आ जाएगी। ऐसा एक बच्चा एम्स में एक साल से है जिसे कोई गोद नहीं ले रहा। भाटी ने कहा कि सिर्फ चार सप्ताह के लिए गर्भ जारी रहना चाहिए उसके बाद आराम से बच्चे का जन्म हो जाएगा। बच्चा भी जिंदा रहेगा और मां को भी खतरा नहीं होगा। अभी गर्भपात कराने से बच्ची को भी जीवनभर की सेहत संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं। भाटी ने कोर्ट से इजाजत मांगी कि इस संबंध में नाबालिग और उसके माता पिता से बात की जाए उनकी काउंसलिंग करने की जाए और उसके बाद आकर एम्स फिर कोर्ट बताएगा।
कोर्ट ने कहा कि बच्ची एम्स में ही ऐसे में उसकी और माता पिता की काउंसलिग से किसने रोका है। लेकिन गर्भपात का फैसला बच्ची और माता पिता का होना चाहिए एम्स उन्हें सोच समझकर फैसला लेने में मदद कर सकता है लेकिन उन्हें फैसला लेने दें। कोर्ट ने कहा कि गर्भवती मां की प्रजनन स्वायत्ता को सबसे ज्यादा अहमियत दी जानी चाहिए। कोर्ट ने एम्स से कहा कि वह अपनी क्यूरेटिव याचिका वापस ले ले उस पर जोर न दे। और लौटकर एम्स कोर्ट न आए। माता पिता आ सकते हैं।
इससे पहले गत बुधवार 29 अप्रैल को कोर्ट ने एम्स की गर्भपात के आदेश के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी और आदेश का पालन करने का निर्देश दिया था। इसके बाद आनन फानन में एम्स ने आज सुबह ही क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर कोर्ट से एक बार फिर आदेश में बदलाव का अनुरोध किया था जिसके लिए कोर्ट राजी नहीं हुआ।
एम्स के डाक्टर भी कोर्ट आये थे और उनहोंने भी पक्ष रखा लेकिन कोर्ट प्रभावित नहीं हुआ।इस मामले में गत 24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने महिला की प्रजनन स्वायत्ता और इच्छा को सर्वोपरि बताते हुए नाबालिग के सात माह के अनचाहे गर्भ को नष्ट करने की इजाजत दी थी और एम्स से गर्भपात करने को कहा था।
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