नई दिल्ली। संसद ने सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित कर दिया है। राज्यसभा ने चर्चा के बाद विधेयक को लोकसभा को वापस भेज दिया। लोकसभा ने इसे सोमवार को पारित किया था। यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करता है। इसके अंतर्गत भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की वर्तमान संख्या 33 से बढ़ाकर 37 की जाएगी। इसी वर्ष मई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने के लिए एक अध्यादेश जारी किया था।
राज्यसभा में हुई बहस का उत्तर देते हुए केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के आदर्श वाक्य पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि देश के लोग हर क्षेत्र में सुधार देख रहे हैं और यह विधेयक न्यायिक सुधारों का ही एक हिस्सा है। श्री मेघवाल ने कहा कि इससे सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक दक्षता में वृद्धि होगी। उन्होंने कहा कि आवश्यकतानुसार सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या नियमित रूप से बढ़ाई जाती है।
श्री मेघवाल ने कहा कि न्यायपालिका द्वारा मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए सरकार ने कई पहल की हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के बढ़ते कार्यभार, न्यायिक मामलों की बदलती प्रकृति और उभरते संवैधानिक और कानूनी व्याख्या संबंधी मुद्दों को देखते हुए, सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना समय की आवश्यकता और एक तात्कालिक सुधार है।
इससे पहले, चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस के विवेक तन्खा ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने के अध्यादेश के उद्देश्य पर प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में 95 हजार मामले लंबित हैं।
चर्चा में भाग लेते हुए भारतीय जनता पार्टी की संगीता यादव ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से संबंधित विधेयक को ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विधेयक का उद्देश्य देश के नागरिकों के लिए सुलभ और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना है। सुश्री यादव ने कहा कि कई मामले एक दशक से अधिक समय से लंबित हैं। उन्होंने विधेयक को देश की न्यायिक प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
तृलमूल कांग्रेस की डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने दावा किया कि सभी उच्च न्यायालयों में 30 प्रतिशत पद रिक्त हैं। विधेयक का समर्थन करते हुए डीएमके के आर. गिरिराजन ने कहा कि न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या में कमी आने की उम्मीद है। बीजू जनता दल के डॉ. सस्मित पात्रा ने भी इस विधेयक का समर्थन किया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में बुनियादी ढांचे के विकास की आवश्यकता पर भी बल दिया। वाईएसआरसीपी के एस निरंजन रेड्डी ने इस बात का उल्लेख किया कि प्रति न्यायाधीश मामलों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है।
एआईएडीएमके के आई एस इनबादुराई ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 38 करना एक सामयिक और आवश्यक सुधार है। उन्होंने सरकार से मद्रास उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के रिक्त पदों को भरने का भी आग्रह किया, क्योंकि 75 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या के मुकाबले केवल 52 न्यायाधीश ही हैं। शिवसेना की डॉ ज्योति एन० वाघमारे ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि यह कानून जनता में नया विश्वास जगाएगा और त्वरित न्याय सुनिश्चित करेगा। एनसीपी के राजेंद्र जैन, आप के संजय सिंह, शिवसेना के मिलिंद देवरा, टीडीपी के विजय चिंताकयाला, जेएमएम की महुआ माजी और अन्य सदस्यों ने चर्चा में भाग लिया।
विधेयक को लोकसभा में वापस भेजने के बाद सदन में विशेष उल्लेख सत्र शुरू हुआ, जिसमें विभिन्न सदस्यों ने जन महत्व के मुद्दे उठाए। कार्यवाही पूरी होने के बाद, उपसभापति ने सदन को आज के लिए स्थगित कर दिया और कल सुबह 11 बजे फिर से बैठक करने का आदेश दिया।

















