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Sunday, July 12, 2026


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CAA भारतीय संविधान की भावना का प्रतीक, किसी को डरने की नहीं जरूरत

नागरिकता संशोधन अधिनियम को केंद्र सरकार द्वारा लागू कर दिया गया है। अलबत्ता, कानून को लेकर समुदाय विशेष के लोगों के मन में कुछ भ्रांतियां व मिथक व्याप्त हैं जबकि यह कानून स्पष्ट कहता है की कानून केवल कुछ विदेशियों को नागरिकता प्रदान करने के लिए है, यह किसी भारतीय से नागरिकता छीनता नहीं है। यह उन हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई एवं पारसियों को नागरिकता प्रदान करने का मुद्दा है जो उत्पीड़न का सामना करके अपने-अपने देशों से आए हैं।
दीगर है कि भारत के विभाजन की पूर्व संध्या पर, यह आशा की गई थी कि भारत और पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यक नागरिकों को नागरिक अधिकार और सम्मान का जीवन मिलेगा। इसमें धर्म और परंपरा पर उनके अधिकार शामिल थे। हालांकि, अफगानिस्तान, पाकिस्तान या बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा नहीं की गई। ऐतिहासिक नेहरू-लियाकत समझौते को दिल्ली समझौते के रूप में भी जाना जाता है, जिस पर 8 अप्रैल, 1950 को भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। इसमें कहा गया था कि अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को राजनीतिक या अन्य कार्यालयों में तैनात होने और अपने देश के नागरिक और सशस्त्र बलों में सेवा करने के लिए सार्वजनिक जीवन में भाग लेने का समान अवसर दिया जाएगा। ।

इसलिए उतपन्न हुई नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) की आवश्यकता

दिल्ली समझौते में कहा गया कि वे अपनी धार्मिक प्रथाओं का पालन करने के लिए स्वतंत्र होंगे। भारत ने अपना वादा निभाया, लेकिन हमारे पड़ोसी अपने वादे निभाने में विफल रहे। पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या 22 से घटकर 7% हो गई है। वहीं, भारतीय अल्पसंख्यकों की आबादी 23 से 30 फीसदी तक बढ़ गई है। यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में गैर- मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कमजोर स्थिति को उजागर करता है। जबकि, भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सीईसी और सीजेआई जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर मुस्लिम समुदाय के लोग रहे हैं। लेकिन, तीनों पड़ोसी देश अपने अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों का सम्मान करने में विफल रहे। इसलिए, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) की आवश्यकता उत्पन्न हुई।

भारत से सटे तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों की समस्या के समाधान के लिए लाया अधिनियम

अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश भारत से सटे इस्लामिक मान्यता वाले देश हैं। अफगान संविधान का अनुच्छेद 2 इसे एक इस्लामिक राज्य बनाता है। इसी प्रकार बांग्लादेशी और पाकिस्तानी संविधान भी यही घोषणा करते हैं। भारत-पाकिस्तान की सीमा 3,323 किलोमीटर, भारत-बांग्लादेश की सीमा 4,096 किलोमीटर और भारत-अफगानिस्तान की सीमा 106 किलोमीटर है। हमारी भौगोलिक सीमा से सटे तीनों देशों की कानूनी व्याख्या अलग-अलग हो सकती है लेकिन ये एक तरह से इस्लामिक राज्य हैं। किसी भी इस्लामी राज्य/गणराज्य में रहने वाले मुसलमानों पर किसी भी धार्मिक आधार पर अत्याचार की उम्मीद नहीं की जा सकती। हालांकि, उस राज्य के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। यह अधिनियम भारत की भूमि सीमा से सटे इन तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों की समस्या के समाधान के लिए लाया गया है। सीएए इन धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनके सभी पिछले दस्तावेजों को नजरअंदाज करके नागरिकता देकर इन सभी देशों में किए गए धार्मिक उत्पीडन को खत्म कर रहा है।

अतीत में नहीं उठाया गया कोई सवाल

आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 में समाप्त होने वाली 5 साल की अवधि में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से 560 से अधिक मुस्लिम शरणार्थी भारत आए हैं। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि भारतीय कानून धर्म के आधार पर भेदभाव करता है। इसके अलावा, नागरिकता संशोधन अधिनियम स्थायी समिति, संयुक्त समिति आदि से होकर गुजरा था, जिससे लोकतांत्रिक संसदीय प्रक्रिया का सम्मान हुआ। अतीत में भी, युगांडा और श्रीलंकाई शरणार्थियों को नागरिकता देने के भारत के संप्रभु निर्णय पर धार्मिक आधार पर कोई सवाल नहीं उठाया गया था, न ही 1971 में, जब बांग्लादेशी शरणार्थियों को नागरिकता दी गई थी, तब कोई सवाल उठाया गया था। सीएए द्वारा संहिताबद्ध किए जाने वाले ऐसे मानवीय कार्यों पर अब ऐसे सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए।

कानून अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नहीं

यह गलत धारणा है कि यह कानून अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ है। हालाँकि, इस देश के मुसलमानों के लिए चिंता का सवाल नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे नागरिक हैं और बने रहेंगे, उन्हें कोई परेशान नहीं कर सकता। सीएए एक प्रासंगिक प्रश्न कि, “क्या भारत द्वारा दुनिया में कहीं से भी किसी भी अवैध मुस्लिम प्रवासी को नागरिकता दी जानी चाहिए?” का नकारात्मक उत्तर देता है । सीएए उन विशिष्ट वर्गों के लिए है, जिनके पास अपने धर्मों के लिए अनुकूल माहौल नहीं है और वे अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीन देशों में प्रताड़ित हो रहे हैं।

भारतीय संविधान की भावना का प्रतीक है सीएए

सीएए भारतीय संविधान की भावना का प्रतीक है। इसलिए भारतीय मुसलमानों को डरने की कोई जरूरत नहीं है। इस कानून से किसी भी अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम भाई-बहनों को कोई नुकसान नहीं होता है, क्योंकि यह कानून केवल कुछ विदेशियों को नागरिकता देता है, किसी भारतीय से नागरिकता छीनता नहीं है। किसी की नागरिकता छीनने का सवाल ही नहीं उठता। यह उन हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसियों को नागरिकता देने का मुद्दा है जो उत्पीड़न का सामना करके अपने-अपने देशों से आए हैं। अधिनियम के तहत, नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 2(1)(बी) में प्रावधान है कि जो प्रवासी बिना पासपोर्ट, वीजा और यात्रा दस्तावेजों के भारत आते हैं, या जिनके पासपोर्ट और वीजा की अवधि समाप्त हो चुकी है, उन्हें अवैध प्रवासी माना जाता है। लेकिन अब, 06 श्रेणियों, अर्थात् हिंदू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध और ईसाई, जो तीन देशों अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आते हैं, को अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा। नागरिकता अधिनियम की एक नई धारा 6 (बी) में प्रस्ताव है कि यदि धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोग निर्दिष्ट शर्तों को अपनाकर अपना पंजीकरण कराते हैं, तो वे नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे। इसके अलावा, यदि ऐसे प्रवासी नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 5 या तीसरी अनुसूची की शर्तों को पूरा करने के बाद नागरिकता प्राप्त करते हैं, तो उन्हें उस तारीख से नागरिकता दी जाएगी जिस दिन वे भारत में आए थे। कई शरणार्थी 31 दिसंबर 2014 से पहले आए हैं, उन सभी को उनके आने की तारीख से नागरिकता मिल जाएगी।

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