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Monday, May 4, 2026


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‘पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगा सकते हैं प्रदूषण बोर्ड’, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला बरकरार रखा

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में पर्यावरणीय क्षति के लिए क्षतिपूर्ति और प्रतिपूरक क्षतिपूर्ति लगाने के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के अधिकारों को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा है कि जहां तक पर्यावरणीय व्यवस्था की बात है तो इसके केंद्र में दो अहम बातें ‘रोकथाम और उपचार’ शामिल होनी चाहिए।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि जल एवं वायु अधिनियमों के प्रावधानों के तहत प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड संवैधानिक और वैधानिक दोनों रूप से वास्तविक या संभावित पर्यावरणीय क्षति के लिए क्षतिपूर्ति लगाने के लिए सशक्त हैं।
जस्टिस नरसिम्हा ने फैसले में लिखा, ”भारतीय पर्यावरण कानूनों को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों पर विचार करने के बाद हमने माना है कि पर्यावरण नियामक – प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जल एवं वायु अधिनियमों के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए निश्चित धनराशि के रूप में प्रतिपूरक या क्षतिपूर्ति लागू कर सकते हैं या संभावित पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिए पूर्व-उपाय के रूप में बैंक गारंटी प्रस्तुत करने की आवश्यकता लागू कर सकते हैं।”
फैसले में कहा गया कि ये शक्तियां जल एवं वायु अधिनियमों की धारा 33ए और 31ए के तहत प्रदत्त शक्तियों के अतिरिक्त और सहायक हैं। साथ ही, हमने निर्देश दिया है कि इन शक्तियों का प्रयोग अधीनस्थ विधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाना चाहिए जिसमें प्राकृतिक न्याय और पारदर्शिता के आवश्यक सिद्धांतों को शामिल किया गया हो।
हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह के हर्जाने आपराधिक दंड से भिन्न होते हैं क्योंकि ये दीवानी प्रकृति के होते हैं और इनका उद्देश्य उल्लंघनकर्ताओं को दंडित करने के बजाय पर्यावरणीय क्षति को रोकना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद कर दिया, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की मांग करने की शक्तियों को सीमित कर दिया गया था। इस फैसले ने ”प्रदूषणकर्ता भुगतान करे” और एहतियाती सिद्धांतों को पर्यावरण कानून के केंद्रीय सिद्धांतों के रूप में पुष्ट किया।
कोर्ट ने कहा, ”पर्यावरण नियामकों का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वे वास्तविक पर्यावरणीय क्षति की परवाह किए बिना निवारक उपाय अपनाएं और उन्हें लागू करें। इन नियामकों द्वारा पूर्व-निर्धारित कार्रवाई की जानी चाहिए और इस उद्देश्य के लिए जल एवं वायु अधिनियम की धारा 33ए और 31ए के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक निश्चित उपाय आवश्यक है।”

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