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Friday, April 24, 2026


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केंद्र की चंडीगढ़ को अनुच्छेद-240 के तहत लाने की तैयारी, पंजाब के सियासी दलों में मचा घमासान

चंडीगढ़: पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी चंडीगढ़ को पंजाब राज्यपाल के संवैधानिक दायरे से बाहर लाने की तैयारी की जा रही है। एक दिसंबर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार इस संदर्भ में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक-2025 लाएगी। जिसके तहत चंडीगढ़ का अलग प्रशासक नियुक्त किया जा सकेगा जबकि अभी पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ़ के प्रशासक होते हैं। अब यहां एलजी को बतौर प्रशासक नियुक्त किया जा सकेगा।
केंद्र ने यूटी चंडीगढ़ को संविधान के अनुच्छेद-240 के दायरे में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है, जो राष्ट्रपति को इस संबंध में सीधे कानून बनाने का अधिकार देता है। इस विधेयक का मकसद चंडीगढ़ को अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा नगर हवेली और दमन व दीव और पुडुचेरी (जब वहां की विधानसभा भंग या निलंबित हो) जैसे बिना विधानसभा वाले दूसरे केंद्र शासित प्रदेशों की तरह संविधान के अनुच्छेद-240 के दायरे में लाना है।
संसद में पेश होने वाले इस संशोधन विधेयक के बाद पंजाब में सियासी हंगामा शुरू हो गया है। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी समेत कांग्रेस व शिअद के नेताओं ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। पंजाब के सीएम भगवंत मान ने भी इस पर कड़ा विरोध जताया है। बताते चलें कि अभी पंजाब के राज्यपाल के पास ही यूटी चंडीगढ़ के प्रशासक का पद होता है।
इस संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे नेताओं का कहना है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद चंडीगढ़ पर पंजाब का प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण खत्म हो जाएगा । नेताओं का आरोप है कि ऐसा कर चंडीगढ़ को हरियाणा को सौंपने के लिए रास्ता बनाया जा रहा है। अभी यूटी चंडीगढ़ में कर्मचारी अनुपात हरियाणा का 40 प्रतिशत जबकि पंजाब का 60 प्रतिशत है। दोनों राज्यों से कर्मचारी व अधिकारी यूटी में डेपुटेशन पर भेजे जाते हैं।
सीएम भगवंत मान ने कहा संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे प्रस्तावित संविधान (131वां संशोधन) बिल का आप सरकार कड़ा विरोध करती है। यह संशोधन पंजाब के हितों के विरुद्ध है। हम केंद्र सरकार द्वारा पंजाब के विरुद्ध रची जा रही साजिश को कामयाब नहीं होने देंगे। हमारे पंजाब के गांवों को उजाड़कर बने चंडीगढ़ पर सिर्फ पंजाब का हक है। हम अपना हक यूं ही जाने नहीं देंगे। इसके लिए जो भी कदम उठाने पड़ेंगे, हम उठाएंगे।
केंद्र सरकार ने साल 1970 में चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने संबंधी एक प्रस्ताव को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया था। बाद में राजीव-लोंगोवाल समझौते में चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने की समय सीमा जनवरी 1986 तय की गई थी। इस समझौते को संसद ने भी मंजूरी दी थी लेकिन यह लागू नहीं हो सका। अब यदि यह संशोधन विधेयक पारित होता है तो चंडीगढ़ पर पंजाब का संवैधानिक अधिकार कम हो जाएगा।
पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि इस संशोधन विधेयक से पंजाब की राजधानी पर ऐतिहासिक व भावनात्मक दावे को प्रभावी रूप से कमजोर किया जा सकेगा। केंद्र सरकार जान-बूझकर चंडीगढ़, नदियों के जल और पंजाब विश्वविद्यालय पर पंजाब के वैध अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस विधायक परगट सिंह ने कहा कि ये संशोधन बिल चंडीगढ़ को पंजाब से पूरी तरह छीनने का भाजपा का एजेंडा है। जिसके तहत केंद्र सरकार चंडीगढ़ के प्रशासनिक ढांचे में बड़ा बदलाव करने जा रही है। चंडीगढ़ के प्रशासक की शक्तियां जोकि अभी तक राज्यपाल के पास थीं, संशोधन के बाद यह शक्तियां चंडीगढ़ के लिए नियुक्त किए जाने वाले अलग प्रशासक के पास होंगी। पंजाब इस गैर-संवैधानिक दखल को कभी स्वीकार नहीं करेगा।
पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी स्थिति साफ करने की अपील की है। उन्होंने चेताते हुए कहा कि चंडीगढ़ पंजाब का है और इसे छीनने की किसी भी कोशिश के गंभीर नतीजे होंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान से भी अपील की है कि वे तुरंत इस मसले पर केंद्र से बात करें। उधर, शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि संशोधन बिल पारित हुआ तो यह उन पंजाबियों के साथ धोखा और भेदभाव होगा, जिन्होंने देश के लिए सबसे अधिक बलिदान दिया है। यह चंडीगढ़ को पंजाब के प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण से स्थायी रूप से बाहर करने की कोशिश है। यह संघवाद की भावना के भी खिलाफ है।

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