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Monday, August 24, 2026


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‘व्हाट्सएप या ई-मेल से नोटिस भेजना वैध नहीं’, शीर्ष कोर्ट ने खारिज की आदेश में संशोधन की मांग वाली याचिका

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत व्हाट्सएप और ईमेल से नोटिस भेजना वैध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा राज्य की ओर से अपने जनवरी 2025 के आदेश में संशोधन की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा राज्य ने याचिका दायर की थी। इसमें सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई और अन्य 2025 में पारित आदेश में संशोधन की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि बीएनएसएस 2023 की धारा 64(2) सिस्टम-जनरेटेड समन यानी ई-समन एप से संबंधित है। जबकि धारा 71 विधिवत हस्ताक्षरित, स्कैन और इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजे गए भौतिक समन से संबंधित है, इसलिए किसी वॉटरमार्क सील की अलग से कोई आवश्यकता नहीं है। बीएनएसएस की धारा 35 के तहत एक नोटिस धारा 71 के तहत समन की ही श्रेणी में आता है और इसलिए इसे इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रेषित करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
इस पर पीठ ने कहा कि धारा 35 के तहत नोटिस की तामील इस मूल अधिकार की रक्षा के लिए की जानी चाहिए, क्योंकि नोटिस का पालन न करने से व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ सकता है। बीएनएसएस 2023 को सीधे तौर पर पढ़ने पर पता लगता है कि विधानमंडल ने इलेक्ट्रॉनिक संचार के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए हैं। पीठ ने कहा कि बीएनएस की धारा 35 के तहत जारी नोटिस धारा 71 के तहत जारी समन की ही श्रेणी में नहीं आता है। क्योंकि धारा 71 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से तामील की अनुमति देती है। धारा 71 के तहत जारी समन और उसके गैर-अनुपालन का किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तत्काल प्रभाव नहीं पड़ता है। जबकि धारा 35 के तहत जारी नोटिस का अनुपालन न होने पर व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तत्काल प्रभाव पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे पुलिस को सीआरपीसी की धारा 41ए या बीएनएसएस की धारा 35 के तहत नोटिस भेजने के लिए केवल वहीं तरीके अपनाने का निर्देश दें, जिनकी कानून के तहत अनुमति हो। व्हाट्सएप या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से नोटिस भेजना सीआरपीसी और बीएनएसएस के तहत तय की गई विधियों का विकल्प नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल और सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को तीन हफ्ते के भीतर अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।

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