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Sunday, August 9, 2026


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वेतन सीमा में संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, केंद्र सरकार को चार महीने में निर्णय लेने का आदेश

नई दिल्ली: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत आने वाले करोड़ों कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ईपीएफओ योजना के लिए वेतन सीमा (वेज सीलिंग) को बदलने पर विचार करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने सरकार को इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए चार महीने की समय सीमा तय की है। गौरतलब है कि पिछले 11 वर्षों से ईपीएफओ की वेतन सीमा में कोई बदलाव नहीं किया गया है, जिसके कारण बड़ी संख्या में कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर हैं।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वह दो सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार के समक्ष अपना अभ्यावेदन और कोर्ट के आदेश की प्रति प्रस्तुत करें। इसके बाद, केंद्र सरकार को इस मामले पर चार महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में कहा कि वर्तमान में ईपीएफओ योजना उन कर्मचारियों को कवरेज से बाहर रखती है जिनका मासिक वेतन 15,000 रुपये से अधिक है। यह सीमा आखिरी बार 2014 में संशोधित की गई थी।
ईपीएफओ नियमों में ₹15,000 की सीमा अनिवार्य सदस्यता और स्वैच्छिक सदस्यताके बीच की विभाजक रेखा है। ईपीएफ योजना, 1952 के पैरा 2(f) के तहत एक अपवर्जित कर्मचारी वह है, जिसका ‘वेतन’ (बेसिक + डीए) नौकरी ज्वाइन करते समय निर्धारित वैधानिक सीमा (वर्तमान में ₹15,000) से अधिक है। जो पहले से ही फंड का सदस्य नहीं है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी कर्मचारी का मूल वेतन और डीए ₹15,001 है, तो उसे PF का सदस्य बनना कानूनन अनिवार्य नहीं है। हालांकि, वह पैरा 26(6) के तहत नियोक्ता की सहमति के साथ स्वेच्छा से सदस्य बन सकता है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने अदालत में तर्क दिया कि पिछले एक दशक में वेतन सीमा में संशोधन न होने से विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो गई है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित न्यूनतम वेतन (मिनिमम वेज) अब 15,000 रुपये की ईपीएफओ वेतन सीमा से अधिक हो गया है।
याचिका में कहा गया है कि यह विसंगति संगठित क्षेत्र के बहुसंख्यक श्रमिकों को ईपीएफओ योजना के लाभों और सुरक्षा से वंचित कर रही है, जो कि अनिवार्य रूप से एक सामाजिक कल्याण योजना है। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि वेतन सीमा से अधिक कमाई करने वाले कर्मचारियों को योजना का लाभ न मिलना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश लाखों कर्मचारियों के लिए उम्मीद की किरण है। यदि केंद्र सरकार वेतन सीमा को संशोधित करती है, तो संगठित क्षेत्र के वे कर्मचारी जो वर्तमान में 15,000 रुपये से अधिक के मूल वेतन के कारण पीएफ (PF) के दायरे से बाहर हैं, वे भी सामाजिक सुरक्षा नेट में शामिल हो सकेंगे। अब सभी की निगाहें अगले चार महीनों में केंद्र सरकार द्वारा लिए जाने वाले निर्णय पर टिकी हैं।

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