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Tuesday, August 11, 2026


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अभी से हवा में बढ़ने लगा ‘जहर’, दिल्ली-एनसीआर में रहने वालों की घट रही उम्र

नई दिल्ली: पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े उठाकर देखें तो पता चलता है कि सर्दियां आते ही राजधानी दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण और धुंध से घिर जाता है। वायु प्रदूषण राजनीति के विषय से इतर सेहत के लिए गंभीर चिंता का कारण रहा है जिससे हर साल लोगों को दो-चार होना पड़ता है। इस बार का मामला थोड़ा और डराता दिख रहा है। सितंबर के मध्य से ही दिल्ली-एनसीआर में धुंध का असर दिखने लगा है। वायु प्रदूषण की हालिया खबरों के मुताबिक हवा की गुणवत्ता अभी से खराब होनी शुरू हो गई है।
बुधवार (17 सितंबर) को सुप्रीम कोर्ट ने भी इसपर चिंता जाहिर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान कहा कि वायु प्रदूषण चिंताजनक है। किसान देश के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें बिना रोक-टोक पराली जलाने दी जाए। शीर्ष कोर्ट ने सुझाव दिया कि किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए गिरफ्तारी समेत कठोर दंड लागू किए जा सकते हैं, ताकि इससे होने वाले वायु प्रदूषण को कम किया जा सके।
गौरतलब है कि कई रिपोर्ट्स में विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि बढ़ता प्रदूषण सेहत के लिए न सिर्फ गंभीर समस्याओं का कारण बनता जा रहा है बल्कि इसके संपर्क में रहने वालों की उम्र भी कम होती जा रही है जोकि काफी डराने वाली बात है। एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि दिल्ली-एनसीआर के निवासियों की जहरीली हवा के कारण 8 साल से तक आयु कम हो सकती है।
बुधवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोड़ों को निर्देश दिया कि वे सर्दियों से पहले वायु प्रदूषण को रोकने के उपायों का ब्योरा तीन सप्ताह के भीतर तैयार करें। सर्दियों में प्रदूषण काफी बढ़ जाता है। पीठ ने प्रदूषण नियंत्रण बोडों में खाली पदों को लेकर नाखुशी जाहिर की और उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब सरकारों को तीन माह के भीतर इन्हें भरने का आदेश दिया।
हाल ही में अमेरिका स्थित शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (EPIC) की एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स (AQLI) 2025 रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण भारत के लिए सबसे गंभीर स्वास्थ्य खतरा बनकर उभरा है, जिससे देश की औसत जीवन प्रत्याशा 3.5 वर्ष कम हो रही है।
अध्ययन में पाया गया है कि जहरीली हवा भारतीयों के लिए खतरनाक है। बचपन और मातृ कुपोषण के मुकाबले ये जीवन के लगभग दोगुने साल छीन लेती है वहीं अशुद्ध जल, स्वच्छता और हाथ धोने के प्रभाव की तुलना में पांच गुना अधिक प्रभावित होती है। भारत में अधिकतर लोग विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से अधिक प्रदूषण वाले इलाकों में रहते हैं।
वायु प्रदूषण का मतलब है हवा में हानिकारक गैसों, धूल के कण (PM2.5, PM10), धुआं, औद्योगिक रसायन और वाहन से निकलने वाला धुआं का मिल जाना। ये प्रदूषक हमारी सांसों के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल करीब 70 लाख लोगों की समय से पहले मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है। सबसे खतरनाक तत्व PM2.5 है, जो बाल की मोटाई से भी 30 गुना छोटा होता है। यह हमारे फेफड़ों में गहराई तक जाकर खून तक पहुंच सकता है और धीरे-धीरे शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है। इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है क्योंकि इसका असर तुरंत नहीं दिखता, बल्कि धीरे-धीरे बीमारियां पैदा करता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, वायु प्रदूषण का सीधा असर हमारे फेफड़ों पर पड़ता है। लगातार धूल और धुएं में सांस लेने से ब्रॉन्काइटिस, अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) जैसी बीमारियां हो सकती हैं। खासकर बच्चे और बुजुर्ग ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 20 लाख मौतें फेफड़ों की बीमारियों से होती हैं, जिनमें वायु प्रदूषण का बड़ा योगदान है। फेफड़ों के अलावा इससे हृदय स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। PM2.5 खून में घुलकर इसे गाढ़ा बना देते हैं, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की एक स्टडी बताती है कि प्रदूषण से हृदय रोग का खतरा 20% तक बढ़ सकता है।

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