नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने आज गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में सज़ा की कम दर पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि ऐसे 90 प्रतिशत से ज़्यादा मामलों में ट्रायल के बाद आरोपी बरी हो जाते हैं। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने जम्मू-कश्मीर के रहने वाले सैयद इफ़्तिखार अंद्राबी को नशीले पदार्थों से जुड़े आतंकवाद के एक मामले में ज़मानत देते हुए ये टिप्पणियां कीं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 2019 से 2023 के बीच पूरे देश में यूएपीए के तहत सज़ा की दर 2 से 6 प्रतिशत के बीच रही। पीठ ने पाया कि जम्मू-कश्मीर में इसी दौरान सज़ा की दर 1 प्रतिशत से भी कम थी, जिससे यह संकेत मिलता है कि आरोपियों के बरी होने की आशंका बहुत ज़्यादा है।
अदालत ने यह सवाल उठाया कि क्या सिर्फ़ इसलिए किसी को लंबे समय तक हिरासत में रखा जाना चाहिए क्योंकि उस पर लगे आरोप गंभीर हैं। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि अंद्राबी या उसके घर और काम करने की जगह से कोई नकदी या कोई भी प्रतिबंधित सामान बरामद नहीं हुआ था। पीठ ने यह भी पाया कि अंद्राबी को फंसाने वाले बयान पुलिस के सामने दिए गए थे, जो पहली नज़र में ‘साक्ष्य अधिनियम’ के प्रावधानों के तहत मान्य नहीं माने जा सकते।
न्यायालय ने यह भी पाया कि अंद्राबी का आतंकवाद या नशीले पदार्थों के व्यापार से पुराना आपराधिक रिकॉर्ड या संबंध होने का कोई भी सबूत रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया गया था। राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण ने आरोप लगाया था कि आरोपी सीमा पार से हेरोइन की तस्करी में शामिल थे और नशीले पदार्थों के व्यापार से होने वाली कमाई का इस्तेमाल लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी आतंकवादी गतिविधियों को वित्त-पोषित करने के लिए किया जाता था।

















