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Monday, December 15, 2025


20 साल बाद भी बिहार की सत्ता का पर्याय हैं नीतीश

पटना। बिहार में विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनती नजर आ रही है। इस तरह बिहार में अब बीते 20 वर्षों की तर्ज पर ही नीतीश के फिर से सत्ता के शीर्ष पर काबिज होना तय हो गया है। 2005 के अंत में शुरू हुआ नीतीश कुमार का शासन अब अगले पांच साल चल सकता है।
आखिर नीतीश कुमार कौन हैं, उनका सियासी सफर कैसा रहा है? बिहार में 2005 में पहली बार नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद से अब तक क्या-क्या हुआ है? किस तरह राज्य में अलग-अलग पार्टियों की सीटें और वोट प्रतिशत लगातार ऊपर-नीचे हुए हैं, लेकिन नीतीश कुमार किंग या किंगमेकर ही रहे हैं? इसके अलावा कैसे कम सीटें और वोट पाने के बावजूद नीतीश कुमार ने कैसे अपनी सत्ता बनाए रखी? आइये जानते हैं…
नीतीश कुमार का जन्म 1951 में नालंदा के कल्याण बीघा गांव में हुआ था। नीतीश के पिता देश के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल रहे थे, ऐसे में वे खुद सियासत में काफी रुचि रखते थे। वे राम मनोहर लोहिया की समाजवादी नीतियों से काफी प्रभावित थे। बताया जाता है कि उनके और लालू प्रसाद यादव के सियासी सफर की शुरुआत लगभग एक ही समय हुई थी। यह समय था कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी नेतृत्व का। कर्पूरी ठाकुर जनता पार्टी की सरकार के दौरान 1970 के दशक में बिहार में ओबीसी आरक्षण के अगुआ रहे थे।
नीतीश पहली बार सियासत में 1977 में उतरे, जब पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बन चुका था। इस दौर में जनता पार्टी मजबूती से उभरी और लगभग पूरे देश में वर्चस्व बनाया। हालांकि, नीतीश कुमार चुनावी राजनीति में बेहतर शुरुआत नहीं कर पाए। वे जनता पार्टी की तरफ से हरनौत विधानसभा सीट से उतरे और एक निर्दलीय उम्मीदवार से हार गए। यह वह दौर था, जब नीतीश कुमार ने निराशा में राजनीति तक छोड़ने का मन बना लिया था। हालांकि, उनके करीबियों ने किसी तरह उन्हें मना लिया। 1985 में वे एक बार फिर हरनौत सीट से ही लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़े और आखिरकार जीते। बाद में नीतीश ने 1989 में लोकसभा चुनाव में बाढ़ से जीत हासिल करने के बाद वे बिहार की राजनीति से कुछ दूर भी हुए। वे वीपी सिंह की सरकार में कृषि राज्य मंत्री बने। 1991 में उन्होंने जनता दल के टिकट पर बाढ़ से फिर जीत हासिल की। हालांकि, तीन साल बाद ही उन्होंने जनता दल से अलग होकर 1994 में जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी बना ली। उनका यही धड़ा बाद में जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू बना।
1990 का दौर, जब लालू की सीएम कुर्सी को उनके ‘छोटे भाई’ से ही हुआ खतरा
1990 के दौर में बिहार में लालू प्रसाद यादव का वर्चस्व स्थापित हो चुका था। वे लगातार दो बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि, भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उन्होंने खुद पद छोड़ दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया। यह वह दौर था, जब लालू को पिछड़ी जातियों का जबरदस्त समर्थन मिला था, हालांकि चारा घोटाले में नाम आने के बाद उनका यह मतदाता आधार उनसे दूरी बनाने लगा था। यही वह दौर था, जब इंजीनियर से नेता बने नीतीश कुमार उभर पर आए। कभी लालू प्रसाद यादव के ‘छोटे भाई’ के तौर पर उनके विश्वासपात्र माने जाने वाले नीतीश ने धीरे-धीरे पिछड़ी जातियों, खासकर कुर्मी-कुशवाहा समाज को अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया। इसके अलावा उन्होंने अति-पिछड़ा समाज (ईबीसी) के बीच भी पैठ बनाई। इस जातीय समीकरण को बिठाकर उन्होंने लालू यादव के समर्थन में खड़े यादव समुदाय की एकजुटता की काट खोजी।
साल 2000 आते-आते नीतीश कुमार नेता के तौर पर मजबूत होते चले गए। 2000 का चुनाव मार्च में हुआ था। गौर करने वाली बात यह है कि तब तक बिहार से झारखंड अलग नहीं हुआ था। इस चुनाव में भी राजद मजबूती से उभरी। उसने 324 में से 293 सीटों पर चुनाव लड़ा और 124 सीटें जीतीं। पार्टी बहुमत से दूर रह गई। दूसरी तरफ भाजपा को इस चुनाव में बढ़त मिली और उसे 168 में से 67 सीटें मिलीं। नीतीश कुमार की समता पार्टी 34 सीट और कांग्रेस 23 सीटें जीतने में सफल रही।

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